48 करोड़ की सड़क पर सवाल: निर्माण पूरा होने से पहले ही उखड़ने लगी गिट्टियां, ग्रामीणों ने उठाए गुणवत्ता और निगरानी पर गंभीर प्रशन48 करोड़ की सड़क पर सवाल: निर्माण पूरा होने से पहले ही उखड़ने लगी गिट्टियां, ग्रामीणों ने उठाए गुणवत्ता और निगरानी पर गंभीर प्रशन

कटनी/बरही। बगैहा मोड़ से खितौली तक लगभग 26 किलोमीटर लंबे सड़क मार्ग का करीब 48 करोड़ रुपये की लागत से निर्माण कार्य इन दिनों सवालों के घेरे में है। ग्रामीणों द्वारा लगातार शिकायतें और विरोध दर्ज कराने के बाद कुछ समय के लिए निर्माण कार्य में तेजी दिखाई गई, लेकिन अब फिर से काम की रफ्तार धीमी पड़ने के आरोप सामने आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों रुपये की इस परियोजना में न केवल निर्माण की गति धीमी है, बल्कि गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

ग्रामीणों के अनुसार सड़क का निर्माण अभी पूरी तरह पूरा भी नहीं हुआ है और कई स्थानों पर सड़क की सतह से गिट्टियां उखड़ने लगी हैं। कुछ जगहों पर कथित रूप से थेगरी लगाकर सुधार कार्य किए जाने की बात भी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब नई सड़क निर्माणाधीन अवस्था में ही मरम्मत मांगने लगे, तो निर्माण की गुणवत्ता और तकनीकी निगरानी किस स्तर की है।

निर्माण से पहले ही मरम्मत पर सवाल

नदावन गांव से केवट सलैया मार्ग की स्थिति को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी है। उनका कहना है कि भारी वाहनों की आवाजाही और निर्माण सामग्री के कारण कई संपर्क मार्ग क्षतिग्रस्त हो गए हैं। वहीं निर्माणाधीन सड़क के विभिन्न हिस्सों में सामग्री की गुणवत्ता, सड़क की मजबूती और कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि जनता के करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, इसलिए उन्हें ऐसी सड़क चाहिए जो वर्षों तक टिकाऊ रहे, न कि कुछ ही समय में मरम्मत की जरूरत पड़ने लगे।

नालियां बनीं, लेकिन पानी निकासी की व्यवस्था अधूरी

सड़क के साथ बनाई जा रही नालियों को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं। कई स्थानों पर नालियां अधूरी हैं या उनमें उचित आउटलेट की व्यवस्था नहीं है। बारिश के दौरान जलभराव और पानी के घरों की ओर जाने की आशंका से ग्रामीण चिंतित हैं।

तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार सड़क की मजबूती केवल डामर और गिट्टी पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उचित जल निकासी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि पानी सड़क की बेस लेयर तक पहुंचता है तो सड़क की आयु प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या नालियों की ढाल और जल निकासी की तकनीकी जांच नियमित रूप से की जा रही है।

पहले बने हिस्सों की गुणवत्ता पर भी सवाल

ग्रामीणों ने पहले से बने सड़क, पुलिया और नाली निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि कई स्थानों पर काम संतोषजनक नहीं है और गुणवत्ता की बजाय कार्य पूर्ण दिखाने पर अधिक जोर दिया गया।

ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मार्ग की एक साथ तकनीकी जांच कराई जाए और केवल शिकायत वाले स्थानों तक जांच सीमित न रहे।

बगैहा में अधूरा निर्माण बना परेशानी का कारण

ग्राम बगैहा में अधूरे निर्माण कार्य, खुली नालियों और कीचड़ से ग्रामीण परेशान हैं। खुले नालों से दुर्घटना का खतरा बना हुआ है, जबकि अधूरे सड़क निर्माण और मिट्टी के ढेरों के कारण बारिश में आवागमन प्रभावित हो रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण एजेंसी को सड़क निर्माण के साथ सुरक्षा और जल निकासी की व्यवस्था पर भी ध्यान देना चाहिए था।

निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि लोक निर्माण विभाग के अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण करते हैं, लेकिन इतनी बड़ी परियोजना में नियमित तकनीकी निगरानी आवश्यक है। सड़क की मोटाई, बेस की गुणवत्ता, गिट्टी की ग्रेडिंग, डामर की मात्रा और नालियों की ढाल जैसे बिंदुओं की लगातार जांच जरूरी है।

सवाल यह भी है कि क्या निर्माण कार्य की जांच केवल कागजी रिकॉर्ड तक सीमित है या वास्तव में सामग्री और निर्माण की गुणवत्ता का परीक्षण भी कराया जा रहा है।

सीएम हेल्पलाइन में शिकायत, फिर भी असंतोष

ग्रामीणों के अनुसार निर्माण कार्य की गुणवत्ता और धीमी गति को लेकर सीएम हेल्पलाइन सहित विभिन्न स्तरों पर शिकायतें की गई हैं। उनका दावा है कि शिकायतों के समाधान में वास्तविक स्थिति और शिकायतकर्ताओं के पक्ष को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

स्वतंत्र तकनीकी जांच की मांग

ग्रामीणों ने मांग की है कि बगैहा मोड़ से खितौली तक पूरे मार्ग की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। जांच में सड़क की मोटाई, बेस की गुणवत्ता, डामर की मात्रा, पुलिया, नालियों की ढाल और जल निकासी व्यवस्था को शामिल किया जाए। जहां भी मानकों से कम निर्माण पाया जाए, वहां सुधारात्मक कार्रवाई की जाए और जिम्मेदारी तय हो।

ग्रामीणों का सीधा सवाल

ग्रामीणों का कहना है कि यह सड़क उनके लिए केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की जीवनरेखा है। इसलिए वे कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर गुणवत्तापूर्ण विकास चाहते हैं।

अब देखना होगा कि लोक निर्माण विभाग ग्रामीणों द्वारा उठाए गए इन सवालों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या 48 करोड़ रुपये की इस परियोजना में गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी।

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