1.46 लाख घनमीटर रेत गायब, 27.44 करोड़ का जुर्माना! रेत माफिया पर शिकंजा, लेकिन जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही पर बड़ा सवाल

कटनी। जिले में रेत के भंडारण और परिवहन से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है। कटनी कलेक्टर न्यायालय ने मेसर्स विस्टा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड पर करीब 27 करोड़ 44 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। न्यायालय के आदेश के मुताबिक सेंड पोर्टल पर फर्म के नाम 1 लाख 46 हजार 462 घनमीटर रेत दर्ज थी, लेकिन विजयराघवगढ़ के पुरैनी स्थित भंडारण स्थल की जांच में मौके पर महज 100 घनमीटर रेत मिली।

यानी रिकॉर्ड में दर्ज रेत में से करीब 1 लाख 46 हजार 362 घनमीटर रेत मौके से गायब मिली। इस मात्रा की रेत के परिवहन को लेकर वैध ई-ट्रांसपोर्ट पास यानी ETP भी प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

रिकॉर्ड में रेत का पहाड़, मौके पर सिर्फ 100 घनमीटर

कलेक्टर न्यायालय के आदेश में सामने आए आंकड़े कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। पोर्टल पर लाखों घनमीटर रेत का स्टॉक दर्ज था, लेकिन जब प्रशासनिक जांच हुई तो मौके पर लगभग पूरा स्टॉक गायब मिला।

इतनी बड़ी मात्रा में रेत के परिवहन के लिए हजारों वाहन फेरे लगने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर रेत का परिवहन हुआ, तो बिना वैध ETP के इतने बड़े पैमाने पर वाहन आखिर कैसे गुजरते रहे?

खनिज, राजस्व और पुलिस की निगरानी पर सवाल

रेत के अवैध खनन, परिवहन और भंडारण पर कार्रवाई की जिम्मेदारी अलग-अलग स्तर पर संबंधित विभागों की होती है।खनिज विभाग को स्टॉक, पोर्टल एंट्री और ETP की निगरानी करनी होती है। राजस्व विभाग के अधिकारियों, जिसमें SDM और तहसीलदार स्तर के अधिकारी शामिल हैं, को अपने क्षेत्र में अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई का अधिकार है।वहीं पुलिस प्रशासन को भी संदिग्ध वाहनों की जांच और कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है।

लेकिन इस मामले में इतनी बड़ी मात्रा में रेत के स्टॉक के गायब होने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां थी?

27.44 करोड़ का जुर्माना, लेकिन अधिकारियों की भूमिका पर जांच कब?

कलेक्टर न्यायालय ने रॉयल्टी राशि करीब 1 करोड़ 83 लाख रुपये के आधार पर 15 गुना जुर्माना लगाते हुए फर्म पर लगभग 27 करोड़ 44 लाख रुपये की कार्रवाई की है।

ठेकेदार पर हुई यह कार्रवाई निश्चित तौर पर बड़ी है, लेकिन इस पूरे मामले ने प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आखिर लाखों घनमीटर रेत का स्टॉक रिकॉर्ड में दर्ज रहा और फिर मौके से लगभग पूरा स्टॉक गायब हो गया, तो इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को पहले क्यों नहीं हुई?

क्या स्टॉक का नियमित सत्यापन किया गया था?

क्या पोर्टल पर दर्ज रेत और मौके के स्टॉक का समय-समय पर मिलान हुआ था?

और अगर ETP के बिना रेत का परिवहन हुआ, तो रास्ते में तैनात जिम्मेदार अमले ने कार्रवाई क्यों नहीं की?

सिर्फ ठेकेदार पर कार्रवाई से खत्म होगा खेल?

यह मामला अब केवल जुर्माने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जरूरत इस बात की भी है कि उस अवधि में तैनात खनिज विभाग, राजस्व विभाग और पुलिस प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो अगर जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या नियमों की अनदेखी सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए क्योंकि सवाल सिर्फ 1.46 लाख घनमीटर रेत का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी राजस्व से जुड़े इतने बड़े स्टॉक की निगरानी व्यवस्था आखिर कैसे विफल हुई?

27 करोड़ 44 लाख रुपये की कार्रवाई ने रेत कारोबार की एक बड़ी तस्वीर सामने रख दी है। अब देखना यह होगा कि जांच की आंच सिर्फ फर्म तक पहुंचती है या उन अधिकारियों तक भी, जिनकी जिम्मेदारी इस पूरे सिस्टम की निगरानी की थी।

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