
कटनी की झमाझम बारिश ने इस बार दशहरे की परंपरा की पोल खोल दी। कागज़-लठ्ठों का बना रावण पूरी तरह भीग गया और जल ही नहीं सका। लोग यह देख हँसते रहे—“लगता है रावण पानी में डूबकर ही मरना चाहता है।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच रावण मर रहा है, या फिर पुतलों के धुएँ में ज़िंदा रावण और खड़ा चौड़ा मुस्कुरा रहा है?
सच तो यह है कि हर साल हम मिलजुलकर रावण बनाते हैं, फिर मिलकर ही उसे जलाते हैं। यह परंपरा है या आत्मप्रवंचना? बाहर के रावण को जलाने का शोर तो बहुत है, पर भीतर बैठे अहंकार, भ्रष्टाचार और लालच के रावण को कौन जलाएगा?
विडंबना देखिए—रावण ने सीता का अपहरण किया, लेकिन छुआ तक नहीं। और आज? गली-मोहल्लों में रोज़ बलात्कार हो रहे हैं। फिर भी हम बड़े गर्व से पुतला जलाकर घोषणा करते हैं कि “बुराई पर अच्छाई की जीत हुई।” वाह! क्या शानदार अभिनय है।
असलियत यह है कि रावण का पुतला जलता है, मगर असली रावण सरकारी दफ्तरों में फाइलों पर जमे रहते हैं।
पुतला जलता है, लेकिन घोटालों की राख हर साल मोटी होती जाती है।
पुतला जलता है, पर सड़क पर चंदा बटोरने वाले असली राक्षस अगले दिन फिर डमरू बजाकर खड़े हो जाते हैं।
हर साल बुद्धिजीवी सवाल करते हैं—“रावण क्यों जलाते हो?”
सच पूछिए तो सवाल जलाने या न जलाने का नहीं, बल्कि समझने का है। अगर जलाना ही है, तो भ्रष्टाचार का पुतला जलाइए, आतंकवाद का पुतला जलाइए, अज्ञानता और अहंकार का पुतला जलाइए।
कटनी का भीगा हुआ पुतला कहीं संकेत तो नहीं था?
शायद नियति कह रही हो कि अब नाटक बहुत हो गया, असली दहन कीजिए।
वरना हर साल पुतले जलेंगे, पटाखे फूटेंगे, और असली रावण छाता तानकर हमारे बीच घूमते रहेंगे, हँसते रहेंगे और कहते रहेंगे—
“मुझे जलाना इतना आसान नहीं।”






