
कटनी/ न्यूज़.वॉइस.ऑफ़.इंडिया, मध्य प्रदेश से एक बड़ी विडंबना सामने आ रही है।
एक ओर मध्य प्रदेश सरकार शराब बिक्री से भारी राजस्व अर्जित कर रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य की पुलिस आम नागरिकों को नशे से दूर रहने की शपथ दिलाती नजर आ रही है।
सवाल ये उठता है कि जब नशा बिकेगा, खुलेआम शराब की दुकानें सजेंगी, तो फिर नशे से दूरी की शपथ क्या सिर्फ दिखावा बनकर रह गई है।
असल में, प्रदेश सरकार को शराब से दोहरी कमाई हो रही है।
पहली कमाई शराब बिक्री से मिलने वाला राजस्व
दूसरी कमाई उसी शराब के सार्वजनिक सेवन पर जुर्माना और कानूनी कार्यवाही से मिलने वाला राजस्व।
जी हां, शराब खरीदना कानूनन मान्य है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थल पर शराब पीते पकड़ा जाए तो पुलिस IPC की धारा 151 के तहत कार्यवाही करती है। अगर कोई शराब पीकर वाहन चलाता पाया गया तो धारा 185 के तहत चालान, और मोटर व्हीकल एक्ट के तहत ₹10,000 तक का जुर्माना।
इसके साथ ही अगर कोई होटल, ढाबा या दुकान शराब परोसते पकड़े जाते हैं, तो उनके खिलाफ भी केस बनता है। इन जुर्मानों से भी सरकार की कमाई होती है।
इस तरह देखा जाए तो शराब बिकती है सरकार को टैक्स मिलता है। शराब पीकर पकड़े जाते हैं फिर भी सरकार को जुर्माने के रूप में पैसा मिलता है।
जनता के मन में बड़ा सवाल उठ रहा है जब सरकार खुद नशे के कारोबार से राजस्व कमा रही है, तो नशामुक्ति की अपील क्या सिर्फ एक प्रचार मात्र है।
अगर वाकई सरकार नशे से युवाओं को बचाना चाहती है, तो फिर बिहार की तरह पूर्ण शराबबंदी क्यों नहीं लागू की जाती?
बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साहसिक निर्णय लेकर शराब को पूरी तरह बंद कर दिया, और अब वहां पर शराबबंदी का सख्त पालन होता है।
तो क्या मध्य प्रदेश सरकार को भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए।
नशा मुक्त समाज की परिकल्पना तभी साकार हो सकती है, जब नशे का स्रोत ही पूरी तरह बंद किया जाए – ना शराब बिके, ना पी जाए।









