
भोपाल। तेली समाज में सामाजिक एकता, संगठनात्मक समन्वय और सकारात्मक परिवर्तन की आवश्यकता को लेकर भूतपूर्व सैनिक एवं कर्मा सेना के संस्थापक शम्भू दयाल साहू ने स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि समाज में पद और प्रतिष्ठा से अधिक महत्व सामाजिक योगदान का होना चाहिए। संगठन भले ही अनेक हों, लेकिन समाज के उत्थान का उद्देश्य एक होना चाहिए।
25 अक्टूबर 2026 को भोपाल के जम्बूरी मैदान में प्रस्तावित सामाजिक आयोजन की तैयारियों को लेकर मध्यप्रदेश के तेली समाज के विभिन्न संगठनों की पहली बैठक आयोजित की गई। बैठक में शम्भू दयाल साहू ने अपने विचार रखते हुए वर्षों से संगठनात्मक पदों पर बने पदाधिकारियों से आत्ममंथन करने और नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का अवसर देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जम्बूरी मैदान में होने वाले बड़े सामाजिक आयोजन से जो भी सकारात्मक विचार, उपलब्धियां और परिणाम सामने आएं, उनका लाभ किसी एक संगठन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इनका उपयोग पूरे समाज के विकास, सामाजिक एकता और भविष्य की पीढ़ियों के बेहतर निर्माण के लिए किया जाना चाहिए।
शम्भू दयाल साहू ने संगठन बदलने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सामाजिक क्षेत्र में भी कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ, पद और प्रतिष्ठा के अनुसार संगठन बदलते रहते हैं। हालांकि, असली सवाल किसी संगठन को बदलने का नहीं, बल्कि समाज के प्रति व्यक्ति की निष्ठा और उसके योगदान का है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक संगठनों की ताकत आपसी प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और समन्वय में है। यदि सभी संगठन अपने मतभेदों को भुलाकर साझा उद्देश्य के साथ आगे बढ़ें, तो समाज शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास के क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल कर सकता है।
शम्भू दयाल साहू का कहना है कि वर्षों से पदों पर कार्य कर रहे पदाधिकारियों को नई पीढ़ी के लिए भी रास्ता बनाना चाहिए। युवाओं को जिम्मेदारी और नेतृत्व के अवसर मिलने से संगठन मजबूत होंगे और समाज में नई सोच के साथ सकारात्मक बदलाव आएगा।
उनके संदेश का सार साफ है—पद की राजनीति नहीं, परिवर्तन की पहल हो। संगठन अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन समाजहित का संकल्प एक होना चाहिए।
अब देखना होगा कि जम्बूरी मैदान में प्रस्तावित सामाजिक आयोजन समाज के विभिन्न संगठनों को एक मंच पर लाने और सामूहिक विकास की दिशा में कितनी प्रभावी भूमिका निभाता है। शम्भू दयाल साहू के विचार निश्चित रूप से सामाजिक संवाद, आत्ममंथन और एकजुटता की आवश्यकता को सामने रखते हैं।
संदेश स्पष्ट है—समाज किसी एक संगठन या पदाधिकारी का नहीं, बल्कि हम सभी का है। समन्वय, पारदर्शिता और सकारात्मक परिवर्तन ही समाज की असली ताकत हैं।






