
कटनी में वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। जंगलों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार बीट गार्डों को उनके मूल कार्यक्षेत्र से हटाकर नाकों पर तैनात कर दिया गया है, जिससे वन सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर इस व्यवस्था का जंगलों और वन्यजीवों पर क्या असर पड़ रहा है, जिले में वन विभाग की मौजूदा व्यवस्था अब चिंता का विषय बनती जा रही है। बीट गार्ड, जिनकी जिम्मेदारी जंगलों की निगरानी और सुरक्षा होती है, उन्हें अब नाकों यानी चेक पोस्ट पर ड्यूटी दी जा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो इस फैसले का सीधा असर जंगलों की सुरक्षा पर पड़ रहा है। गार्ड जब नाकों पर तैनात हैं, तो उनके बीट क्षेत्रों में नियमित गश्त नहीं हो पा रही है।
नतीजा यह है कि जंगलों में अवैध लकड़ी कटाई, मवेशियों की घुसपैठ और वन्यजीवों के शिकार का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। गर्मी के मौसम में यह खतरा और भी बढ़ जाता है, जब जंगलों में आग लगने की घटनाएं आम हो जाती हैं और पानी की कमी के चलते वन्यजीव शहर की ओर रुख करने लगते हैं।
जानकारी के मुताबिक, पूर्व डीएफओ द्वारा बीट गार्डों को जंगलों से हटाकर नाकों पर तैनात करने के आदेश दिए गए थे, और वर्तमान डीएफओ भी उसी व्यवस्था को जारी रखे हुए हैं। इस फैसले के चलते हालात में सुधार के बजाय और गिरावट देखने को मिल रही है। पहले से ही स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहे वन विभाग में एक-एक बीट गार्ड पर दो से तीन क्षेत्रों की जिम्मेदारी है। ऐसे में नाकों की ड्यूटी के साथ पूरे क्षेत्र की निगरानी कर पाना लगभग नामुमकिन हो गया है।
हालात को और गंभीर बनाता है नाकों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव कई गार्डों को रहने और जरूरी संसाधनों की भी व्यवस्था नहीं मिल पा रही है, जिससे वे अस्थायी इंतजामों में रहने को मजबूर हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था के चलते वन विभाग को जंगलों की सुरक्षा के लिए निजी मजदूरों पर निर्भर होना पड़ रहा है, जो न तो स्थायी समाधान है और न ही प्रभावी अब बड़ा सवाल यही है कि क्या वन विभाग इस व्यवस्था में सुधार कर जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा को प्राथमिकता देगा, या फिर यह लापरवाही आगे भी जारी रहेगी।






